4464005860401745 श्रीमद् भागवत महापुराण सम्पूर्ण संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित Shrimad Bhagwat Mahapuran with Hindi Meaning इस कलिकाल में 'श्रीमद्भागवत पुराण' हिन्दू समाज का सर्वाधिक आदरणीय पुराण है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। इसे भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश कहना अधिक समीचीन होगा। सैकड़ों वर्षों से यह पुराण हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता आ रहा हैं। इस पुराण में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गुण-सगुण तथा व्यक्त-अव्यक्त रहस्यों का समन्वय उपलब्ध होता है। 'श्रीमद्भागवत पुराण' वर्णन की विशदता और उदात्त काव्य-रमणीयता से ओतप्रोत है। यह विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैरागय का यह महान् ग्रन्थ है। By वनिता कासनियां पंजाब इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है। इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति को वेद सुनने के अधिकार से वंचित किया गया है। ब्राह्मणों को अधिक महत्त्व दिया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों और शूद्रों को वेद सुनने से इसलिए वंचित किया गया था कि उनके पास उन मन्त्रों को श्रवण करके अपनी स्मृति में सुरक्षित रखने का न तो समय था और न ही उनका बौद्धिक विकास इतना तीक्ष्ण था। किन्तु बाद में वैदिक ऋषियों की इस भावना को समझे बिना ब्राह्मणों ने इसे रूढ़ बना दिया और एक प्रकार से वर्गभेद को जन्म दे डाला। 'श्रीमद्भागवत पुराण' में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्राय: पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है, किन्तु इसमें दस विषयों-सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है (दूसरे अध्याय में इन दस लक्षणों का विवेचन किया जा चुका है)। यहाँ श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात् हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं। स्थान पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है। पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को महापुराण मानते हैं। यह भक्तिशाखा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है और आचार्यों ने इसकी अनेक टीकाएँ की है। कृष्ण-भक्ति का यह आगार है। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या 'राधा' का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है। मान्यता कुछ लोग इसे महापुराण न मानकर देवी-भागवत को महापुराण मानते हैं। वे इसे उपपुराण बताते हैं। पर बहुसंख्यक मत इस पक्ष में नहीं हैं। भागवत के रचनाकाल के संबंध में भी विवाद है। दयानंद सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान् इसे छठी शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। इसे किसी दक्षिणात्य विद्वान् की रचना माना जाता है। भागवत पुराण का दसवां स्कंध भक्तों में विशेष प्रिय है। सृष्टि-उत्पत्ति सृष्टि-उत्पत्ति के सन्दर्भ में इस पुराण में कहा गया है- एकोऽहम्बहुस्यामि। अर्थात् एक से बहुत होने की इच्छा के फलस्वरूप भगवान स्वयं अपनी माया से अपने स्वरूप में काल, कर्म और स्वभाव को स्वीकार कर लेते हैं। तब काल से तीनों गुणों- सत्व, रज और तम में क्षोभ उत्पन्न होता है तथा स्वभाव उस क्षोभ को रूपान्तरित कर देता है। तब कर्म गुणों के महत्त्व को जन्म देता है जो क्रमश: अहंकार, आकाश, वायु तेज, जल, पृथ्वी, मन, इन्द्रियाँ और सत्व में परिवर्तित हो जाते हैं। इन सभी के परस्पर मिलने से व्यष्टि-समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड की रचना होती है। यह ब्रह्माण्ड रूपी अण्डां एक हज़ार वर्ष तक ऐसे ही पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसमें से सहस्त्र मुख और अंगों वाले विराट पुरुष को प्रकट किया। उस विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। विराट पुरुष रूपी नर से उत्पन्न होने के कारण जल को 'नार' कहा गया। यह नार ही बाद में 'नारायण' कहलाया। कुल दस प्रकार की सृष्टियाँ बताई गई हैं। महत्तत्व, अहंकार, तन्मात्र, इन्दियाँ, इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव 'मन' और अविद्या- ये छह प्राकृत सृष्टियाँ हैं। इनके अलावा चार विकृत सृष्टियाँ हैं, जिनमें स्थावर वृक्ष, पशु-पक्षी, मनुष्य और देव आते हैं। प्रथम स्कन्ध मे कुन्ती और भीष्म से ‘भक्ति योग’ (Bhakti yoga) के बारे मे बताया गया य और ‘परीक्षित की कथा’ के माध्यम से ये बताया गया है कि एक मरते हुये व्यक्ति को क्या करना चाहिये? क्योकि ये प्रश्न केवल परीक्षित का नही, हम सब का है क्योकि ‘सात दिन’ ही प्रत्येक जीव के पास है, आठवां दिन है ही नही, इन्ही सात दिन मे उसका जन्म होता है और इन्ही सात दिन मे मर जाता है Shrimad Bhagwat Mahapuran Complete Sanskrit Shloka with Hindi Meaning Meaning of Shrimad Bhagwat Mahapuran In this Kalikal 'Srimad Bhagwat Purana' is the most respected Purana of Hindu society. This Vaishnavism सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

🚩🪴गीता ज्ञान🪴🚩शकुनी का सबसे बड़ा रहस्य जो महाभारत युद्ध का मुख्य कारण बना By वनिता कासनियां पंजाब शकुनीकुछ लोग शकुनी को कौरवो का हित चाहने वाला मानते हैं परन्तु आज आप जानेंगे कि वह शकुनी ही था जिसने दोनों पक्षों को महाभारत के युद्ध में मरने के लिए झोंका था । वो शकुनी था जिसने कुरुवंश के विनाश की सपथ ली थी । वो शकुनी था जिसने पांडवों और कौरवों दोनों के ही साथ विश्वासघात किया । आखिर क्यों रची उसने कुरुवंश को ध्वस्त करने की साजिश और किस तरह दिया उसने अपनी साजिश को अंजाम । सारा कुछ आपको बताऊंगी बस बने रहिये अंत तक गीता ज्ञानके साथ ।मित्रो वैसे तो महाभारत युद्ध के लिए कई पात्रों को जिम्मेदार माना जाता है परंतु अधिकतर लोग कौरवों के मामा शकुनी को इस भयानक युद्ध के लिए उत्तरदायी मानते हैं । ये तो हम सभी जानते हैं कि मामा शकुनी बहुत ही बड़ा षड़यत्रकारी, क्रूर, कुटिल बुद्धि और चौसर खेलने में माहिर था ।शास्त्रों की मानें तो महाभारत काल में चौसर यानी द्युतक्रीड़ा में शकुनी को कोई भी नहीं हरा सकता था । लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर उसके चौरस के पासों में ऐसा क्या था जिससे वह खेल में अजय माना जाता था?शकुनी कुरुवंश का विनाश क्यों करना चाहता था?शकुनी का वह सपना जो कभी पूरा नहीं हुआधर्मग्रंथों में वर्णित एक कथा के अनुसार शकुनी और उसका परिवार गांधारी से बहुत ज्यादा प्रेम करता था । वह उसे दुनिया की सारी खुशियां देना चाहता था । गांधारी शिव जी की भक्त भी थी । उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें सौ पुत्रों का वरदान दिया था ।इस बात का पता चलते ही भीष्म पितामह ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र के लिए राजा सुबाला से गांधारी का हाथ मांग लिया परंतु वह इस बात से क्रोधित हो गया । उसने अपने पिता से गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से ना करने की मांग की । किंतु भीष्म पितामह के बल से डरकर राजा सुबाला अपनी पुत्री गांधारी का विवाह अंधे धृतराष्ट्र से करने को तैयार हो गए ।जिसके बाद शकुनी ने मन ही मन कुरुवंश से इसका बदला लेने की ठान ली । मित्रो आपको बता दूँ कि धृतराष्ट से पहले गांधारी का विवाह एक बकरे से हुआ था । दरअसल जब राजा सुबाला ने पंडितों की सलाह पर गांधारी का विवाह सबसे पहले एक बकरे से करवा दिया ताकि बकरे की मृत्यु के बाद उसका दोष ख़त्म हो जाएगा और बाद में गांधारी का विवाह किसी राजा से करवा देंगे ।यह भी पड़ें – अप्सरा के साथ ऋषि ने क्यों किया एक हजार सालों तक भोग विलास?शकुनी को उन पापों की सजा मिली जो उसने कभी किए ही नहीं थेफिर कुछ समय बाद गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हो गया । उधर विवाह के कुछ दिनों बाद जब धृतराष्ट्र को इस घटना के बारे में पता चला तो उन्हें लगा कि गांधार नरेश ने धोखे से एक विधवा का विवाह मेरे साथ करा दिया है । जिसके बाद धृतराष्ट्र ने राजा सुबाला, उनकी पत्नी और उनके पुत्रों को जेल में डाल दिया ।सुबाल के कई पुत्र थे जिनमें शकुनी सबसे छोटा और बुद्धिमान था । जेल में लोगों को चावल के एक एक दाने खाने के लिए दिए जाते थे । गांधार नरेश सुबाला को लगा कि यदि हम सभी चावल के एक एक दाने खाएँगे तो एक दिन सभीअवश्य ही मर जाएँगे । इस से अच्छा है कि वे लोग अपने हिस्से के दाने भी शकुनी को दे दें ताकि वह जीवित रहे ।जब सभी जेल में थे तब उनके पिता ने शकुनी को चौसर में रूचि देखते हुए और मरने से पहले उससे कहा कि तुम मेरे मरने के बाद मेरी हड्डियों से पासा बनाना । इसमें मेरा दर्द और आक्रोश होगा जो तुम्हें चौसर में कभी नहीं हारने देगा । ये पासे हमेशा तुम्हारी आज्ञा मानेंगे ।अपने पिता की मृत्यु के बाद शकुनी ने उनकी कुछ हड्डियां अपने पास रख ली थी । ऐसा भी कहा जाता है कि पासो में उसके पिता की आत्मा वास कर गई थी, जिसकी वजह से वह पासे शकुनी की ही बात मानते थे ।शकुनी चाहता था अपने परिवार की मौत का बदलाराजा सुबाल के आखिरी दिनों में धृतराष्ट्र ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी तो उसने अपने पुत्र शकुनी को आजाद करने को कहा जिसके उपरांत शकुनी आजाद हो गया । बंदीग्रह से बाहर आने के बाद शकुनी अपने लक्ष्य को भूल न जाये इसलिए बंदीग्रह के लोगों ने उसकी एक टांग तोड़ दी । इसी वजह से शकुनी लंगड़ाकर चलता था ।आजाद होने के बाद उसने धृतराष्ट्र से अपने सभी भाइयों और माता पिता के साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध लेने के लिए प्रतिज्ञा ली तथा अपनी कुटिल बुद्धि का प्रयोग कर उन्हें महाभारत जैसे भयानक युद्ध में झोंक दिया । अभी तक आपने जाना कि शकुनी के पासो का रहस्य क्या था । अब आपको बताते हैं कि उसने कहाँ इनका इस्तेमाल किया था ।शकुनी ने अपने मंसूबों को किस तरह अंजाम दियाशकुनी जुआ खेलने में पारंगत था । उसने कौरवों में भी जुए के प्रति मोह जगा दिया था । उस की इस चाल मे कारण केवल पांडवों का ही नहीं बल्कि कौरवों का भी भयंकर अंत छुपा था क्योंकि शकुनी ने कौरव कुल के नाश की प्रतिज्ञा ली थी और उसके लिए उसने दुर्योधन को अपना पहला मोहरा बना लिया था ।वह हर समय केवल मौके की तलाश में रहता था जिसके चलते कौरवों और पांडवों के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ा और कौरव मारे जाए । जब युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का युवराज घोषित किया गया तब शकुनी ने ही लाक्षाग्रह का षड्यंत्र रचा और सभी पांडवों को लाक्षागृह में जिंदा जलाकर मार डालने का प्रयास किया ।वो किसी भी तरह से दुर्योधन को हस्तिनापुर का राजा बनते देखना चाहता था ताकि उसका दुर्योधन पर मानसिक आधिपत् रहे और वह मूर्ख दुर्योधन की मदद से भीष्म पितामह और कुरुवंश का नाश कर सके ।शकुनी ने ही पांडवों के प्रति दुर्योधन के मन मे वैर जगाया और उसे सत्ता को लेकर लोभी बना दिया । शकुनी अपने पासे से छह अंक लाने में उस्ताद था इसलिए वह छह अंक ही कहता था । हालांकि दोस्तों शकुनी के प्रतिशोध की कहानी का वर्णन वेदव्यास द्वारा लिखे गए महाभारत में नहीं मिलता है ।उसने दुर्योधन के अपमान का फायदा उठायाबहुत से विद्वानों का मानना है कि शकुनी मायाजाल और सम्मोहन की मदद से पासो को अपने पक्ष में पलट देता था । जब पासे फेके जाते थे तो कई बार उनके निर्णय पांडवों के पक्ष में होते थे ताकि पांडव भ्रम में रहे कि पासे सही है ।शकुनी के कारण ही महाराज धृतराष्ट्र की ओर से पांडवो व कौरवों में होने वाले मतभेद के बाद पांडवों को एक बंजर क्षेत्र सौंपा गया था लेकिन पांडवों ने अपनी मेहनत से उसे इंद्रप्रस्थ में बदल दिया । युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ के समय दुर्योधन को यह नगरी देखने का मौका मिला ।महल में प्रवेश करने के बाद, दुर्योधन ने इस जल की भूमि को एक विशाल कक्ष समझकर कदम रखा और इस पानी में गिर गया। यह तमाशा देखकर पांडवों की पत्नी द्रौपदी उस पर हंस पड़ी और कहा कि अंधे का पुत्र अंधा था। यह सुनकर दुर्योधन क्रोधित हो गया।दुर्योधन के मन में चल रही बदले की इस भावना को शकुनी ने बढ़ावा दे दिया और इसी का फायदा उठाते हुए उसने पासो का खेल चौसर खेलने की योजना बनाई । उसने दुर्योधन से कहा के तुम इस खेल में जीतकर बदला ले सकते हो । खेल के जरिए पांडवों को हराने के लिए शकुनी ने बड़े प्रेम भाव से सभी पांडु पुत्रों को आमंत्रित किया और फिर शुरू हुआ दुर्योधन वा युधिष्टर के बीच चौसर खेलने का खेल ।पासो के जरिये रखी महाभारत की नीवशकुनी की चौसर की महारत अथवा उसका पासों पर स्वामित्व ऐसा था कि वह जो चाहता था वे अंक पासों पर आ जाते थे और उसकी उंगलियों के घुमाव पर ही पासों के अंक पूर्वनिर्धारित थे । खेल की शुरुआत में पांडवों का उत्साह बढाने के लिए शकुनी ने आरंभ की कुछ पारियों की जीत युधिष्टर के पक्ष में जाने दी ताकि पांडवों में खेल के प्रति उत्साह बढ़ जाए ।जिसके बाद धीरे धीरे खेल के उत्साह में युधिष्टर अपनी सारी दौलत और साम्राज्य जुए में हार गए । अंत में हुआ ये कि शकुनी ने युधिष्ठिर को सब कुछ एक शर्त पर वापस लौटा देने का वादा किया कि यदि वे अपनी पत्नी को दाव पर लगाए । मजबूर होकर युधिष्टर ने शकुनी की बात मान ली और अंत में पांडव यह पारी भी हार गए । इस खेल में द्रौपदी का अपमान कुरुक्षेत्र के महायुद्ध का कारण बना ।इसी तरह की ढेर सारी धार्मिक और ज्ञानवर्धक पोस्ट पड़ते रहने के लिए यहाँ क्लिक करें और व्हाट्सप्प, ग्रुप ज्वाइन करें ।शकुनी अपनी सपथ पूरी होते नहीं देख पाया क्यूंकि महाभारत के युद्ध में वह पहले ही मार दिया गयामहाभारत जैसे भयानक युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने में शकुनि ने अहम भूमिका निभाई थी। इसलिए वह सबसे पहले स्वर्ग पहुंचा, क्योंकि उसने अपने परिवार पर किए गए अपने अत्याचारों का बदला लिया और उसी युद्ध में खुद शहीद हो गया ।पोस्ट पसंद आयी हो तो इसे शेयर जरूर करें । दोस्तो जब हमे परीक्षा मे कोई उत्तर नहीं आता तो हम उत्तर को स्वयं रच लेते हैं । अगर परीक्षा मे हमे उत्तर की एक लाइन भी सही से याद रह जाती है तो हम उस लाइन के सहारे पूरा पन्ना भर देते हैं । ठीक इसी तरह शास्त्र का ज्ञान अगर आप ने थोड़ा बहुत भी पढ़ रखा है तो आपके मुश्किल वक्त मे यह आपके काम जरूर आएगा ।इसलिए हम आपसे निवेदन करते हैं कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और परोपकार के इस सुअवसर का लाभ लें । इसके साथ ही मुझे इजाजत दें, हमेसा की तरह अंत तक बने रहने के लिए शुक्रिया ।

🚩🪴गीता ज्ञान🪴🚩 शकुनी का सबसे बड़ा रहस्य जो महाभारत युद्ध का मुख्य कारण बना                                       By वनिता कासनियां पंजाब  शकुनी कुछ लोग शकुनी को कौरवो का हित चाहने वाला मानते हैं परन्तु आज आप जानेंगे कि वह शकुनी ही था जिसने दोनों पक्षों को  महाभारत  के युद्ध में मरने के लिए झोंका था । वो शकुनी था जिसने कुरुवंश के विनाश की सपथ ली थी । वो शकुनी था जिसने पांडवों और कौरवों दोनों के ही साथ विश्वासघात किया । आखिर क्यों रची उसने कुरुवंश को ध्वस्त करने की साजिश और किस तरह दिया उसने अपनी साजिश को अंजाम । सारा कुछ आपको बताऊंगी बस बने रहिये अंत तक गीता ज्ञानके साथ । मित्रो वैसे तो महाभारत युद्ध के लिए कई पात्रों को जिम्मेदार माना जाता है परंतु अधिकतर लोग कौरवों के मामा शकुनी को इस भयानक युद्ध के लिए उत्तरदायी मानते हैं । ये तो हम सभी जानते हैं कि मामा शकुनी बहुत ही बड़ा षड़यत्रकारी, क्रूर, कुटिल बुद्धि और चौसर खेलने में माहिर था । शास्त्रों की मानें तो महाभारत काल मे...

श्रीमद् भागवत महापुराण सम्पूर्ण संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित Shrimad Bhagwat Mahapuran with Hindi Meaning इस कलिकाल में 'श्रीमद्भागवत पुराण' हिन्दू समाज का सर्वाधिक आदरणीय पुराण है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। इसे भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश कहना अधिक समीचीन होगा। सैकड़ों वर्षों से यह पुराण हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता आ रहा हैं। इस पुराण में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गुण-सगुण तथा व्यक्त-अव्यक्त रहस्यों का समन्वय उपलब्ध होता है। 'श्रीमद्भागवत पुराण' वर्णन की विशदता और उदात्त काव्य-रमणीयता से ओतप्रोत है। यह विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैरागय का यह महान् ग्रन्थ है। By वनिता कासनियां पंजाब इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है। इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति को वेद सुनने के अधिकार से वंचित किया गया है। ब्राह्मणों को अधिक महत्त्व दिया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों और शूद्रों को वेद सुनने से इसलिए वंचित किया गया था कि उनके पास उन मन्त्रों को श्रवण करके अपनी स्मृति में सुरक्षित रखने का न तो समय था और न ही उनका बौद्धिक विकास इतना तीक्ष्ण था। किन्तु बाद में वैदिक ऋषियों की इस भावना को समझे बिना ब्राह्मणों ने इसे रूढ़ बना दिया और एक प्रकार से वर्गभेद को जन्म दे डाला। 'श्रीमद्भागवत पुराण' में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्राय: पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है, किन्तु इसमें दस विषयों-सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है (दूसरे अध्याय में इन दस लक्षणों का विवेचन किया जा चुका है)। यहाँ श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात् हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं। स्थान पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है। पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को महापुराण मानते हैं। यह भक्तिशाखा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है और आचार्यों ने इसकी अनेक टीकाएँ की है। कृष्ण-भक्ति का यह आगार है। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या 'राधा' का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है। मान्यता कुछ लोग इसे महापुराण न मानकर देवी-भागवत को महापुराण मानते हैं। वे इसे उपपुराण बताते हैं। पर बहुसंख्यक मत इस पक्ष में नहीं हैं। भागवत के रचनाकाल के संबंध में भी विवाद है। दयानंद सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान् इसे छठी शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। इसे किसी दक्षिणात्य विद्वान् की रचना माना जाता है। भागवत पुराण का दसवां स्कंध भक्तों में विशेष प्रिय है। सृष्टि-उत्पत्ति सृष्टि-उत्पत्ति के सन्दर्भ में इस पुराण में कहा गया है- एकोऽहम्बहुस्यामि। अर्थात् एक से बहुत होने की इच्छा के फलस्वरूप भगवान स्वयं अपनी माया से अपने स्वरूप में काल, कर्म और स्वभाव को स्वीकार कर लेते हैं। तब काल से तीनों गुणों- सत्व, रज और तम में क्षोभ उत्पन्न होता है तथा स्वभाव उस क्षोभ को रूपान्तरित कर देता है। तब कर्म गुणों के महत्त्व को जन्म देता है जो क्रमश: अहंकार, आकाश, वायु तेज, जल, पृथ्वी, मन, इन्द्रियाँ और सत्व में परिवर्तित हो जाते हैं। इन सभी के परस्पर मिलने से व्यष्टि-समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड की रचना होती है। यह ब्रह्माण्ड रूपी अण्डां एक हज़ार वर्ष तक ऐसे ही पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसमें से सहस्त्र मुख और अंगों वाले विराट पुरुष को प्रकट किया। उस विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। विराट पुरुष रूपी नर से उत्पन्न होने के कारण जल को 'नार' कहा गया। यह नार ही बाद में 'नारायण' कहलाया। कुल दस प्रकार की सृष्टियाँ बताई गई हैं। महत्तत्व, अहंकार, तन्मात्र, इन्दियाँ, इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव 'मन' और अविद्या- ये छह प्राकृत सृष्टियाँ हैं। इनके अलावा चार विकृत सृष्टियाँ हैं, जिनमें स्थावर वृक्ष, पशु-पक्षी, मनुष्य और देव आते हैं। प्रथम स्कन्ध मे कुन्ती और भीष्म से ‘भक्ति योग’ (Bhakti yoga) के बारे मे बताया गया य और ‘परीक्षित की कथा’ के माध्यम से ये बताया गया है कि एक मरते हुये व्यक्ति को क्या करना चाहिये? क्योकि ये प्रश्न केवल परीक्षित का नही, हम सब का है क्योकि ‘सात दिन’ ही प्रत्येक जीव के पास है, आठवां दिन है ही नही, इन्ही सात दिन मे उसका जन्म होता है और इन्ही सात दिन मे मर जाता है Shrimad Bhagwat Mahapuran Complete Sanskrit Shloka with Hindi Meaning Meaning of Shrimad Bhagwat Mahapuran In this Kalikal 'Srimad Bhagwat Purana' is the most respected Purana of Hindu society. This Vaishnavism

 श्रीमद् भागवत महापुराण सम्पूर्ण संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित

Shrimad Bhagwat Mahapuran with Hindi Meaning
इस कलिकाल में 'श्रीमद्भागवत पुराण' हिन्दू समाज का सर्वाधिक आदरणीय पुराण है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। इसे भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश कहना अधिक समीचीन होगा। सैकड़ों वर्षों से यह पुराण हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता आ रहा हैं।


इस पुराण में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गुण-सगुण तथा व्यक्त-अव्यक्त रहस्यों का समन्वय उपलब्ध होता है। 'श्रीमद्भागवत पुराण' वर्णन की विशदता और उदात्त काव्य-रमणीयता से ओतप्रोत है। यह विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैरागय का यह महान् ग्रन्थ है।
इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है। 
इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति को वेद सुनने के अधिकार से वंचित किया गया है। ब्राह्मणों को अधिक महत्त्व दिया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों और शूद्रों को वेद सुनने से इसलिए वंचित किया गया था कि उनके पास उन मन्त्रों को श्रवण करके अपनी स्मृति में सुरक्षित रखने का न तो समय था और न ही उनका बौद्धिक विकास इतना तीक्ष्ण था। किन्तु बाद में वैदिक ऋषियों की इस भावना को समझे बिना ब्राह्मणों ने इसे रूढ़ बना दिया और एक प्रकार से वर्गभेद को जन्म दे डाला।

'श्रीमद्भागवत पुराण' में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्राय: पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है, किन्तु इसमें दस विषयों-सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है (दूसरे अध्याय में इन दस लक्षणों का विवेचन किया जा चुका है)। यहाँ श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात् हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं। 
स्थान


पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है। पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को महापुराण मानते हैं। यह भक्तिशाखा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है और आचार्यों ने इसकी अनेक टीकाएँ की है। कृष्ण-भक्ति का यह आगार है। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या 'राधा' का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है।
मान्यता

कुछ लोग इसे महापुराण न मानकर देवी-भागवत को महापुराण मानते हैं। वे इसे उपपुराण बताते हैं। पर बहुसंख्यक मत इस पक्ष में नहीं हैं। भागवत के रचनाकाल के संबंध में भी विवाद है। दयानंद सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान् इसे छठी शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। इसे किसी दक्षिणात्य विद्वान् की रचना माना जाता है। भागवत पुराण का दसवां स्कंध भक्तों में विशेष प्रिय है। 
सृष्टि-उत्पत्ति

सृष्टि-उत्पत्ति के सन्दर्भ में इस पुराण में कहा गया है- एकोऽहम्बहुस्यामि। अर्थात् एक से बहुत होने की इच्छा के फलस्वरूप भगवान स्वयं अपनी माया से अपने स्वरूप में काल, कर्म और स्वभाव को स्वीकार कर लेते हैं। तब काल से तीनों गुणों- सत्व, रज और तम में क्षोभ उत्पन्न होता है तथा स्वभाव उस क्षोभ को रूपान्तरित कर देता है। तब कर्म गुणों के महत्त्व को जन्म देता है जो क्रमश: अहंकार, आकाश, वायु तेज, जल, पृथ्वी, मन, इन्द्रियाँ और सत्व में परिवर्तित हो जाते हैं। इन सभी के परस्पर मिलने से व्यष्टि-समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड की रचना होती है। यह ब्रह्माण्ड रूपी अण्डां एक हज़ार वर्ष तक ऐसे ही पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसमें से सहस्त्र मुख और अंगों वाले विराट पुरुष को प्रकट किया। उस विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए।
विराट पुरुष रूपी नर से उत्पन्न होने के कारण जल को 'नार' कहा गया। यह नार ही बाद में 'नारायण' कहलाया। कुल दस प्रकार की सृष्टियाँ बताई गई हैं। महत्तत्व, अहंकार, तन्मात्र, इन्दियाँ, इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव 'मन' और अविद्या- ये छह प्राकृत सृष्टियाँ हैं। इनके अलावा चार विकृत सृष्टियाँ हैं, जिनमें स्थावर वृक्ष, पशु-पक्षी, मनुष्य और देव आते हैं। 
प्रथम स्कन्ध मे कुन्ती और भीष्म से ‘भक्ति योग’ (Bhakti yoga) के बारे मे बताया गया य और ‘परीक्षित की कथा’ के माध्यम से ये बताया गया है कि एक मरते हुये व्यक्ति को क्या करना चाहिये? क्योकि ये प्रश्न केवल परीक्षित का नही, हम सब का है क्योकि ‘सात दिन’ ही प्रत्येक जीव के पास है, आठवां दिन है ही नही, इन्ही सात दिन मे उसका जन्म होता है और इन्ही सात दिन मे मर जाता है

श्रीमद् भागवत महापुराण सम्पूर्ण संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित Shrimad Bhagwat Mahapuran with Hindi Meaning इस कलिकाल में 'श्रीमद्भागवत पुराण' हिन्दू समाज का सर्वाधिक आदरणीय पुराण है। यह वैष्णव सम्प्रदाय का प्रमुख ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में वेदों, उपनिषदों तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय विषयों को अत्यन्त सरलता के साथ निरूपित किया गया है। इसे भारतीय धर्म और संस्कृति का विश्वकोश कहना अधिक समीचीन होगा। सैकड़ों वर्षों से यह पुराण हिन्दू समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता आ रहा हैं।   इस पुराण में सकाम कर्म, निष्काम कर्म, ज्ञान साधना, सिद्धि साधना, भक्ति, अनुग्रह, मर्यादा, द्वैत-अद्वैत, द्वैताद्वैत, निर्गुण-सगुण तथा व्यक्त-अव्यक्त रहस्यों का समन्वय उपलब्ध होता है। 'श्रीमद्भागवत पुराण' वर्णन की विशदता और उदात्त काव्य-रमणीयता से ओतप्रोत है। यह विद्या का अक्षय भण्डार है। यह पुराण सभी प्रकार के कल्याण देने वाला तथा त्रय ताप-आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक आदि का शमन करता है। ज्ञान, भक्ति और वैरागय का यह महान् ग्रन्थ है। By वनिता कासनियां पंजाब इस पुराण में बारह स्कन्ध हैं, जिनमें विष्णु के अवतारों का ही वर्णन है। नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने इस पुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चौबीस अवतारों की कथा कही है।  इस पुराण में वर्णाश्रम-धर्म-व्यवस्था को पूरी मान्यता दी गई है तथा स्त्री, शूद्र और पतित व्यक्ति को वेद सुनने के अधिकार से वंचित किया गया है। ब्राह्मणों को अधिक महत्त्व दिया गया है। वैदिक काल में स्त्रियों और शूद्रों को वेद सुनने से इसलिए वंचित किया गया था कि उनके पास उन मन्त्रों को श्रवण करके अपनी स्मृति में सुरक्षित रखने का न तो समय था और न ही उनका बौद्धिक विकास इतना तीक्ष्ण था। किन्तु बाद में वैदिक ऋषियों की इस भावना को समझे बिना ब्राह्मणों ने इसे रूढ़ बना दिया और एक प्रकार से वर्गभेद को जन्म दे डाला।  'श्रीमद्भागवत पुराण' में बार-बार श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। पुराणों के लक्षणों में प्राय: पाँच विषयों का उल्लेख किया गया है, किन्तु इसमें दस विषयों-सर्ग-विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय का वर्णन प्राप्त होता है (दूसरे अध्याय में इन दस लक्षणों का विवेचन किया जा चुका है)। यहाँ श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करते हुए कहा गया है कि उनके भक्तों की शरण लेने से किरात् हूण, आन्ध्र, पुलिन्द, पुल्कस, आभीर, कंक, यवन और खस आदि तत्कालीन जातियाँ भी पवित्र हो जाती हैं।  स्थान   पुराणों के क्रम में भागवत पुराण पाँचवा स्थान है। पर लोकप्रियता की दृष्टि से यह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। वैष्णव 12 स्कंध, 335 अध्याय और 18 हज़ार श्लोकों के इस पुराण को महापुराण मानते हैं। यह भक्तिशाखा का अद्वितीय ग्रंथ माना जाता है और आचार्यों ने इसकी अनेक टीकाएँ की है। कृष्ण-भक्ति का यह आगार है। साथ ही उच्च दार्शनिक विचारों की भी इसमें प्रचुरता है। परवर्ती कृष्ण-काव्य की आराध्या 'राधा' का उल्लेख भागवत में नहीं मिलता। इस पुराण का पूरा नाम श्रीमद् भागवत पुराण है। मान्यता  कुछ लोग इसे महापुराण न मानकर देवी-भागवत को महापुराण मानते हैं। वे इसे उपपुराण बताते हैं। पर बहुसंख्यक मत इस पक्ष में नहीं हैं। भागवत के रचनाकाल के संबंध में भी विवाद है। दयानंद सरस्वती ने इसे तेरहवीं शताब्दी की रचना बताया है, पर अधिकांश विद्वान् इसे छठी शताब्दी का ग्रंथ मानते हैं। इसे किसी दक्षिणात्य विद्वान् की रचना माना जाता है। भागवत पुराण का दसवां स्कंध भक्तों में विशेष प्रिय है।  सृष्टि-उत्पत्ति  सृष्टि-उत्पत्ति के सन्दर्भ में इस पुराण में कहा गया है- एकोऽहम्बहुस्यामि। अर्थात् एक से बहुत होने की इच्छा के फलस्वरूप भगवान स्वयं अपनी माया से अपने स्वरूप में काल, कर्म और स्वभाव को स्वीकार कर लेते हैं। तब काल से तीनों गुणों- सत्व, रज और तम में क्षोभ उत्पन्न होता है तथा स्वभाव उस क्षोभ को रूपान्तरित कर देता है। तब कर्म गुणों के महत्त्व को जन्म देता है जो क्रमश: अहंकार, आकाश, वायु तेज, जल, पृथ्वी, मन, इन्द्रियाँ और सत्व में परिवर्तित हो जाते हैं। इन सभी के परस्पर मिलने से व्यष्टि-समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड की रचना होती है। यह ब्रह्माण्ड रूपी अण्डां एक हज़ार वर्ष तक ऐसे ही पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसमें से सहस्त्र मुख और अंगों वाले विराट पुरुष को प्रकट किया। उस विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। विराट पुरुष रूपी नर से उत्पन्न होने के कारण जल को 'नार' कहा गया। यह नार ही बाद में 'नारायण' कहलाया। कुल दस प्रकार की सृष्टियाँ बताई गई हैं। महत्तत्व, अहंकार, तन्मात्र, इन्दियाँ, इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव 'मन' और अविद्या- ये छह प्राकृत सृष्टियाँ हैं। इनके अलावा चार विकृत सृष्टियाँ हैं, जिनमें स्थावर वृक्ष, पशु-पक्षी, मनुष्य और देव आते हैं।  प्रथम स्कन्ध मे कुन्ती और भीष्म से ‘भक्ति योग’ (Bhakti yoga) के बारे मे बताया गया य और ‘परीक्षित की कथा’ के माध्यम से ये बताया गया है कि एक मरते हुये व्यक्ति को क्या करना चाहिये? क्योकि ये प्रश्न केवल परीक्षित का नही, हम सब का है क्योकि ‘सात दिन’ ही प्रत्येक जीव के पास है, आठवां दिन है ही नही, इन्ही सात दिन मे उसका जन्म होता है और इन्ही सात दिन मे मर जाता है   Shrimad Bhagwat Mahapuran Complete Sanskrit Shloka with Hindi Meaning  Meaning of Shrimad Bhagwat Mahapuran  In this Kalikal 'Srimad Bhagwat Purana' is the most respected Purana of Hindu society. This Vaishnavism
Shrimad Bhagwat Mahapuran Complete Sanskrit Shloka with Hindi Meaning

Meaning of Shrimad Bhagwat Mahapuran

In this Kalikal 'Srimad Bhagwat Purana' is the most respected Purana of Hindu society. This Vaishnavism

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किन्नरों के भगवान कौन हैं और वह किसके पुत्र थे? किन्नर की 18 रोचक बातें वनिता कासनियां पंजाब द्वारा किन्नरों के बारे में अनेकों किदवंतियाँ हैं। दुनिया में बहुत से लोग हिजड़ों के बारे में बहुत गहराई से जानना चाहते हैं। किन्नर दो शब्दों से मिलकर बना है... किं+नर’ से स्पष्ट है, उनकी योनि और आकृति पूर्णत: मनुष्य की नहीं मानी जाती। यक्षों और गंधर्वों की तरह वे नृत्य और गान में दक्ष इन्हें महादेव का भक्त और गायक समझा जाता है। भोलेनाथ के शाप से बने हिजड़े मान्यता है कि किन्नरों की माँ अरिष्टा थी, जो सदैव सबका अरिष्ट या बुरा सोचती थी और पिता महर्षि और कश्पय थे। द्वेष, दुर्भावना ओर बुराई करने से अगले जन्म किन्नर बनना पड़ता है आज भी पुराणों की मान्यता है कि-बुराई करने, बुरा सोचने तथा दुर्व्यवहार करने से अगले जन्म में किन्नर बनना पड़ता है। भोलेनाथ ने इनकी माँ अरिष्टा को गन्दी, निगेटिव सोच की वजह से इनके बच्चों को हिजड़े होने का शाप दिया था। तथा पश्चाताप हेतु इन्हें धरती पर जन्म लेना पड़ा। हिजड़े जीवन भर शुभ-मङ्गल कार्य एवं शिशु जन्म के समय बलैया ले-लेकर परिवार के सभी सदस्यों को दुआएं देते हैं। इसके फलस्वरूप, जो न्योछावर मिलती है, उसे पुण्यकार्यो में खर्च करते हैं। यदि ये अड़ जाएं, तो नँगा नाच करने से नहीं चूकते। ग्रन्थों में वर्णन है कि- किन्नरों का यह अंतिम जन्म होता है। शतपथ ब्राह्मण (७:५:२:३२) में अश्वमुखी मानव शरीरवाले किन्नर का उल्लेख है। आम लोगों की पांच इन्द्रिय जागृत रहती हैं लेकिन हिजड़ों की छठी इन्द्रिय चेतनायुक्त होने से उन्हें छक्का कहते हैं। किन्नर मोह-माया से दूर इनमें बहुत ज्यादा बेशर्मी पाई जाती है, जो अन्य लोगों के लिए कर पाना असंभव है। शादी-विवाह एवं शुभ कार्यों के समय हिजड़ों की हाजिरी क्यों हैं। जाने किन्नर के धर्म से जुड़े किस्से ऐसा मानते हैं कि- हिजड़ों के ताली बजाने से जो स्पंदन या वायब्रेशन होता है, उससे घर की नकारात्मक/निगेटिव ऊर्जा दूर हो जाती है। अमृतम पत्रिका से साभार...इस ब्लॉग में हिजड़ों के बारे में बहुत ही संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है- वृहनलला, हिजड़े या किन्नरों का इतिहास..सन्दर्भ ग्रन्थ- भविष्यपुराण, महाभारत, गरुड़ पुराण, कठोपनिषद आदि 8 ग्रन्थ के अनुसार यह अति प्रतिष्ठित व महत्वपूर्ण आदिम जाति है जिसके वंशज वर्तमान जनजातीय जिला किन्नौर के निवासी माने जाते हैं। संविधान में भी इन्हें किन्नौरा और किन्नर से संबोधित किया गया है। पौराणिक कथाओं में किन्नर या किंपुरुष देवताओं की एक योनि मानी जाती थी। 5 पांडवों में से एक अर्जुन को भी हिजड़ा बनना पड़ा था। किन्नर देश’ और ‘हिमाचल’ नामक पुस्तक में उल्लेख है कि-किन्नर कैलाश, मणि महेश एवं मानसरोवर की खोज सर्वप्रथम किन्नरों ने ही की थी। हिमालय का पवित्र शिखर कैलाश किन्नरों का प्रधान निवासस्थान था। यहीं हिमवंत एवं हेमकूट क्षेत्रों में बसनेवाली मानव जाति, जो ना स्त्री होते है, ना पुरुष। दरअसल ये लिंग या योनि रहित प्राणी हैं। बौद्ध साहित्य में किन्नर की कल्पना मानवमुखी पक्षी के रूप में की गई है। मानसार में किन्नर के गरुड़मुखी, मानवशरीरी और पशुपदी रूप का वर्णन है।

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🚩🪴गीता ज्ञान🪴🚩शकुनी का सबसे बड़ा रहस्य जो महाभारत युद्ध का मुख्य कारण बना By वनिता कासनियां पंजाब शकुनीकुछ लोग शकुनी को कौरवो का हित चाहने वाला मानते हैं परन्तु आज आप जानेंगे कि वह शकुनी ही था जिसने दोनों पक्षों को महाभारत के युद्ध में मरने के लिए झोंका था । वो शकुनी था जिसने कुरुवंश के विनाश की सपथ ली थी । वो शकुनी था जिसने पांडवों और कौरवों दोनों के ही साथ विश्वासघात किया । आखिर क्यों रची उसने कुरुवंश को ध्वस्त करने की साजिश और किस तरह दिया उसने अपनी साजिश को अंजाम । सारा कुछ आपको बताऊंगी बस बने रहिये अंत तक गीता ज्ञानके साथ ।मित्रो वैसे तो महाभारत युद्ध के लिए कई पात्रों को जिम्मेदार माना जाता है परंतु अधिकतर लोग कौरवों के मामा शकुनी को इस भयानक युद्ध के लिए उत्तरदायी मानते हैं । ये तो हम सभी जानते हैं कि मामा शकुनी बहुत ही बड़ा षड़यत्रकारी, क्रूर, कुटिल बुद्धि और चौसर खेलने में माहिर था ।शास्त्रों की मानें तो महाभारत काल में चौसर यानी द्युतक्रीड़ा में शकुनी को कोई भी नहीं हरा सकता था । लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर उसके चौरस के पासों में ऐसा क्या था जिससे वह खेल में अजय माना जाता था?शकुनी कुरुवंश का विनाश क्यों करना चाहता था?शकुनी का वह सपना जो कभी पूरा नहीं हुआधर्मग्रंथों में वर्णित एक कथा के अनुसार शकुनी और उसका परिवार गांधारी से बहुत ज्यादा प्रेम करता था । वह उसे दुनिया की सारी खुशियां देना चाहता था । गांधारी शिव जी की भक्त भी थी । उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें सौ पुत्रों का वरदान दिया था ।इस बात का पता चलते ही भीष्म पितामह ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र के लिए राजा सुबाला से गांधारी का हाथ मांग लिया परंतु वह इस बात से क्रोधित हो गया । उसने अपने पिता से गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से ना करने की मांग की । किंतु भीष्म पितामह के बल से डरकर राजा सुबाला अपनी पुत्री गांधारी का विवाह अंधे धृतराष्ट्र से करने को तैयार हो गए ।जिसके बाद शकुनी ने मन ही मन कुरुवंश से इसका बदला लेने की ठान ली । मित्रो आपको बता दूँ कि धृतराष्ट से पहले गांधारी का विवाह एक बकरे से हुआ था । दरअसल जब राजा सुबाला ने पंडितों की सलाह पर गांधारी का विवाह सबसे पहले एक बकरे से करवा दिया ताकि बकरे की मृत्यु के बाद उसका दोष ख़त्म हो जाएगा और बाद में गांधारी का विवाह किसी राजा से करवा देंगे ।यह भी पड़ें – अप्सरा के साथ ऋषि ने क्यों किया एक हजार सालों तक भोग विलास?शकुनी को उन पापों की सजा मिली जो उसने कभी किए ही नहीं थेफिर कुछ समय बाद गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से हो गया । उधर विवाह के कुछ दिनों बाद जब धृतराष्ट्र को इस घटना के बारे में पता चला तो उन्हें लगा कि गांधार नरेश ने धोखे से एक विधवा का विवाह मेरे साथ करा दिया है । जिसके बाद धृतराष्ट्र ने राजा सुबाला, उनकी पत्नी और उनके पुत्रों को जेल में डाल दिया ।सुबाल के कई पुत्र थे जिनमें शकुनी सबसे छोटा और बुद्धिमान था । जेल में लोगों को चावल के एक एक दाने खाने के लिए दिए जाते थे । गांधार नरेश सुबाला को लगा कि यदि हम सभी चावल के एक एक दाने खाएँगे तो एक दिन सभीअवश्य ही मर जाएँगे । इस से अच्छा है कि वे लोग अपने हिस्से के दाने भी शकुनी को दे दें ताकि वह जीवित रहे ।जब सभी जेल में थे तब उनके पिता ने शकुनी को चौसर में रूचि देखते हुए और मरने से पहले उससे कहा कि तुम मेरे मरने के बाद मेरी हड्डियों से पासा बनाना । इसमें मेरा दर्द और आक्रोश होगा जो तुम्हें चौसर में कभी नहीं हारने देगा । ये पासे हमेशा तुम्हारी आज्ञा मानेंगे ।अपने पिता की मृत्यु के बाद शकुनी ने उनकी कुछ हड्डियां अपने पास रख ली थी । ऐसा भी कहा जाता है कि पासो में उसके पिता की आत्मा वास कर गई थी, जिसकी वजह से वह पासे शकुनी की ही बात मानते थे ।शकुनी चाहता था अपने परिवार की मौत का बदलाराजा सुबाल के आखिरी दिनों में धृतराष्ट्र ने उसकी अंतिम इच्छा पूछी तो उसने अपने पुत्र शकुनी को आजाद करने को कहा जिसके उपरांत शकुनी आजाद हो गया । बंदीग्रह से बाहर आने के बाद शकुनी अपने लक्ष्य को भूल न जाये इसलिए बंदीग्रह के लोगों ने उसकी एक टांग तोड़ दी । इसी वजह से शकुनी लंगड़ाकर चलता था ।आजाद होने के बाद उसने धृतराष्ट्र से अपने सभी भाइयों और माता पिता के साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध लेने के लिए प्रतिज्ञा ली तथा अपनी कुटिल बुद्धि का प्रयोग कर उन्हें महाभारत जैसे भयानक युद्ध में झोंक दिया । अभी तक आपने जाना कि शकुनी के पासो का रहस्य क्या था । अब आपको बताते हैं कि उसने कहाँ इनका इस्तेमाल किया था ।शकुनी ने अपने मंसूबों को किस तरह अंजाम दियाशकुनी जुआ खेलने में पारंगत था । उसने कौरवों में भी जुए के प्रति मोह जगा दिया था । उस की इस चाल मे कारण केवल पांडवों का ही नहीं बल्कि कौरवों का भी भयंकर अंत छुपा था क्योंकि शकुनी ने कौरव कुल के नाश की प्रतिज्ञा ली थी और उसके लिए उसने दुर्योधन को अपना पहला मोहरा बना लिया था ।वह हर समय केवल मौके की तलाश में रहता था जिसके चलते कौरवों और पांडवों के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ा और कौरव मारे जाए । जब युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का युवराज घोषित किया गया तब शकुनी ने ही लाक्षाग्रह का षड्यंत्र रचा और सभी पांडवों को लाक्षागृह में जिंदा जलाकर मार डालने का प्रयास किया ।वो किसी भी तरह से दुर्योधन को हस्तिनापुर का राजा बनते देखना चाहता था ताकि उसका दुर्योधन पर मानसिक आधिपत् रहे और वह मूर्ख दुर्योधन की मदद से भीष्म पितामह और कुरुवंश का नाश कर सके ।शकुनी ने ही पांडवों के प्रति दुर्योधन के मन मे वैर जगाया और उसे सत्ता को लेकर लोभी बना दिया । शकुनी अपने पासे से छह अंक लाने में उस्ताद था इसलिए वह छह अंक ही कहता था । हालांकि दोस्तों शकुनी के प्रतिशोध की कहानी का वर्णन वेदव्यास द्वारा लिखे गए महाभारत में नहीं मिलता है ।उसने दुर्योधन के अपमान का फायदा उठायाबहुत से विद्वानों का मानना है कि शकुनी मायाजाल और सम्मोहन की मदद से पासो को अपने पक्ष में पलट देता था । जब पासे फेके जाते थे तो कई बार उनके निर्णय पांडवों के पक्ष में होते थे ताकि पांडव भ्रम में रहे कि पासे सही है ।शकुनी के कारण ही महाराज धृतराष्ट्र की ओर से पांडवो व कौरवों में होने वाले मतभेद के बाद पांडवों को एक बंजर क्षेत्र सौंपा गया था लेकिन पांडवों ने अपनी मेहनत से उसे इंद्रप्रस्थ में बदल दिया । युधिष्ठिर द्वारा किए गए राजसूय यज्ञ के समय दुर्योधन को यह नगरी देखने का मौका मिला ।महल में प्रवेश करने के बाद, दुर्योधन ने इस जल की भूमि को एक विशाल कक्ष समझकर कदम रखा और इस पानी में गिर गया। यह तमाशा देखकर पांडवों की पत्नी द्रौपदी उस पर हंस पड़ी और कहा कि अंधे का पुत्र अंधा था। यह सुनकर दुर्योधन क्रोधित हो गया।दुर्योधन के मन में चल रही बदले की इस भावना को शकुनी ने बढ़ावा दे दिया और इसी का फायदा उठाते हुए उसने पासो का खेल चौसर खेलने की योजना बनाई । उसने दुर्योधन से कहा के तुम इस खेल में जीतकर बदला ले सकते हो । खेल के जरिए पांडवों को हराने के लिए शकुनी ने बड़े प्रेम भाव से सभी पांडु पुत्रों को आमंत्रित किया और फिर शुरू हुआ दुर्योधन वा युधिष्टर के बीच चौसर खेलने का खेल ।पासो के जरिये रखी महाभारत की नीवशकुनी की चौसर की महारत अथवा उसका पासों पर स्वामित्व ऐसा था कि वह जो चाहता था वे अंक पासों पर आ जाते थे और उसकी उंगलियों के घुमाव पर ही पासों के अंक पूर्वनिर्धारित थे । खेल की शुरुआत में पांडवों का उत्साह बढाने के लिए शकुनी ने आरंभ की कुछ पारियों की जीत युधिष्टर के पक्ष में जाने दी ताकि पांडवों में खेल के प्रति उत्साह बढ़ जाए ।जिसके बाद धीरे धीरे खेल के उत्साह में युधिष्टर अपनी सारी दौलत और साम्राज्य जुए में हार गए । अंत में हुआ ये कि शकुनी ने युधिष्ठिर को सब कुछ एक शर्त पर वापस लौटा देने का वादा किया कि यदि वे अपनी पत्नी को दाव पर लगाए । मजबूर होकर युधिष्टर ने शकुनी की बात मान ली और अंत में पांडव यह पारी भी हार गए । इस खेल में द्रौपदी का अपमान कुरुक्षेत्र के महायुद्ध का कारण बना ।इसी तरह की ढेर सारी धार्मिक और ज्ञानवर्धक पोस्ट पड़ते रहने के लिए यहाँ क्लिक करें और व्हाट्सप्प, ग्रुप ज्वाइन करें ।शकुनी अपनी सपथ पूरी होते नहीं देख पाया क्यूंकि महाभारत के युद्ध में वह पहले ही मार दिया गयामहाभारत जैसे भयानक युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने में शकुनि ने अहम भूमिका निभाई थी। इसलिए वह सबसे पहले स्वर्ग पहुंचा, क्योंकि उसने अपने परिवार पर किए गए अपने अत्याचारों का बदला लिया और उसी युद्ध में खुद शहीद हो गया ।पोस्ट पसंद आयी हो तो इसे शेयर जरूर करें । दोस्तो जब हमे परीक्षा मे कोई उत्तर नहीं आता तो हम उत्तर को स्वयं रच लेते हैं । अगर परीक्षा मे हमे उत्तर की एक लाइन भी सही से याद रह जाती है तो हम उस लाइन के सहारे पूरा पन्ना भर देते हैं । ठीक इसी तरह शास्त्र का ज्ञान अगर आप ने थोड़ा बहुत भी पढ़ रखा है तो आपके मुश्किल वक्त मे यह आपके काम जरूर आएगा ।इसलिए हम आपसे निवेदन करते हैं कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और परोपकार के इस सुअवसर का लाभ लें । इसके साथ ही मुझे इजाजत दें, हमेसा की तरह अंत तक बने रहने के लिए शुक्रिया ।

🚩🪴गीता ज्ञान🪴🚩 शकुनी का सबसे बड़ा रहस्य जो महाभारत युद्ध का मुख्य कारण बना                                       By वनिता कासनियां पंजाब  शकुनी कुछ लोग शकुनी को कौरवो का हित चाहने वाला मानते हैं परन्तु आज आप जानेंगे कि वह शकुनी ही था जिसने दोनों पक्षों को  महाभारत  के युद्ध में मरने के लिए झोंका था । वो शकुनी था जिसने कुरुवंश के विनाश की सपथ ली थी । वो शकुनी था जिसने पांडवों और कौरवों दोनों के ही साथ विश्वासघात किया । आखिर क्यों रची उसने कुरुवंश को ध्वस्त करने की साजिश और किस तरह दिया उसने अपनी साजिश को अंजाम । सारा कुछ आपको बताऊंगी बस बने रहिये अंत तक गीता ज्ञानके साथ । मित्रो वैसे तो महाभारत युद्ध के लिए कई पात्रों को जिम्मेदार माना जाता है परंतु अधिकतर लोग कौरवों के मामा शकुनी को इस भयानक युद्ध के लिए उत्तरदायी मानते हैं । ये तो हम सभी जानते हैं कि मामा शकुनी बहुत ही बड़ा षड़यत्रकारी, क्रूर, कुटिल बुद्धि और चौसर खेलने में माहिर था । शास्त्रों की मानें तो महाभारत काल मे...